धनंजय वर्मा की आलोचना: एक अविराम यात्रा

- डाॅ. निवेदिता वर्मा



डाॅ. धनंजय वर्मा के आलोचना कर्म को लगभग छह दशक पूरे हो रहे हैं। 1953-55 के आस-पास तो उनका लेखन जगदलपुर (बस्तर) और रायपुर (छत्तीसगढ़) की स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं तक सीमित रहा, लेकिन 1957 से वे ‘आलोचना’ में लगभग नियमित लिखने लगे। 1957-59 में वे सागर विश्वविद्यालय, सागर के एम.ए. (हिन्दी) के विद्यार्थी थे। उनके गुरु आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी तब ‘आलोचना’ के सम्पादक थे। उनके ही निर्देशन में उन्होंने 1959 में निराला के काव्य पर लघु-शोघ-प्रबन्ध लिखा: निराला: काव्य और व्यक्तित्व। यह 1960 में प्रकाशित हो गया। प्रोफेसर अक्षय कुमार जैन के शब्दों में ‘‘उस समय महाप्राण निराला पर कोई प्रामाणिक शोध-ग्रन्थ नहीं आया था। पहले प्रकाशन के बाद ही यह स्तरीय आलोचक मान लिए गए और विश्वविद्यालय में डाॅ. वर्मा के समकालीन डाॅ. शिव कुमार मिश्र याद करते हैं कि ‘‘एम.ए. पास धनंजय वर्मा मात्र उसके नाते डाॅ. धनंजय वर्मा के रूप में चर्चित होने लगे। ऐसा था उनका लघु-प्रबन्ध। ‘‘निराला पर ‘आलोचना’ में डाॅ. इन्द्रनाथ मदान का एक लेख 1962-63 में प्रकाशित हुआ था। उसमें उन्होंने ‘निराला: काव्य और व्यक्तित्व’ के कुछ उद्धरण देते हुए लेखक के रूप में डाॅ. धनंजय वर्मा का उल्लेख किया था। डाॅ. शिवकुमार मिश्र का संकेत उसी ओर है। उसके बाद जब और जहाँ उस पुस्तक का सन्दर्भ दिया गया लेखक के रूप में धनंजय वर्मा, डाॅक्टर की उपाधि के साथ ही याद किये गये। डाॅ. कमला प्रसाद लिखते हैं ‘‘आलोचक के रूप में वे बहुत जल्द दृृश्य में आ गये। मैं सागर विश्वविद्यालय में पढ़ने आया तब धनंजय की किताब ‘‘निराला: काव्य और व्यक्तित्व हिन्दी के विद्यार्थियों में लोकप्रिय थी। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी भी इस किताब को पढ़ने का इशारा करते थे।’’ डाॅ. धनंजय वर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर दूरदर्शन के वृत्त चित्र में डाॅ. कृष्णदत्त पालीवाल कहते हैं: ‘‘धनंजय वर्मा ने निराला पर जो शोधकार्य किया, उसमें उन्होंने एक केन्द्र बनाया और ये स्थापना की, कि निराला छायावाद के ही बड़े रचनाकार नहीं हैं, बल्कि आधुनिक हिन्दी कविता के सबसे बड़े रचनाकार हैं। दूसरा काम ये किया कि निराला की जो बड़ी सशक्त रचनाएँ हैं: ‘राम की शक्ति-पूजा’ और ‘तुलसीदास’ उनमें प्रबन्ध प्रतिमा का जो ढ़ाँचा तोड़ दिया था, उस छायावादी ढ़ाँचे को धनंजय वर्मा ने रचनाओं के भीतर प्रवेश करके प्रस्तुत किया और छायावाद के, आलोचना में संस्थापक, युगप्रवर्तक आलोचक आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी द्वारा लिखित ‘प्राक्कथन’ से इस पुस्तक का महत्त्व स्पष्ट होता है: ‘‘निराला के साहित्य और उनके व्यक्तित्व से सम्बन्धित कई पुस्तकें अब तक प्रकाशित हुई हैं। वे सभी विवेच्य विषय पर अपनी-अपनी दृष्टि से प्रकाश डालती है, परन्तु किसी एक पुस्तक में निराला के व्यक्तित्व, उनकी विचारणा और उनके काव्य का समाहित स्वरूप उपस्थित नहीं हुआ। प्रस्तुत पुस्तक में श्री धनंजय वर्मा ने इनका एक समाहित चित्र देने का प्रयत्न किया है। व्यक्तित्व और जीवनी वाले अध्यायों के परिपाश्र्व में निराला जी के काव्य की समीक्षा की गई है। इस कारण सम्पूर्ण पुस्तक में एक अन्विति और समरसता आ सकी है, जो लेखक की उल्लेखनीय उपलब्धि है। निराला-काव्य का विवेचन आनुक्रमिक भूमिका पर किया गया है, इससे उनकी काव्य-रचना के क्रम-विकास का यथोचित् परिचय मिल जाता है। निराला जी के व्यक्तित्व के अनेक पहलू उनके काव्य में प्रतिच्छायित हुए हैं, परन्तु सूक्ष्मता के साथ और गहराई में जाकर उस प्रतिच्छाया का निर्देश अब तक पर्याप्त रूप में नहीं किया गया है। धनंजय जी ने इस दिशा में भी प्रयास किया है। प्रायः लोग निराला के काव्य को अतिरंजना की दृष्टि से देखते हैं। कुछ समीक्षकों को उनमें सहृदयता की कमी दिखाई दी है। बौद्धिक पक्ष का प्राबल्य जान पड़ा है। कुछ अन्यों को उनकी काव्य-रचना में कोई दोष दिखाई नहीं दिया। इन सबमें संतुलित दृष्टि की कमी रही है। धनंजय वर्मा ने यहाँ एक संतुलन की चेष्टा की है।’’

‘‘निराला जी के अद्यतन काव्य में कुछ नये तत्त्व पाये जाते हैं, जिनकी विवेचना हाल के समीक्षकों ने बहुत ही एकांगी दृष्टि से की है। निराला जी का काव्य-विकास ‘परिमल-गीतिका’ तक एक विशेष दिशा का निदर्शक है। उनकी ‘राम की शक्ति पूजा’ और ‘तुलसीदास’ आदि वृहत्तर रचनाएँ एक दूसरे उत्थान की प्रतिनिधि हैं। ‘कुकरमुत्ता’ से लेकर ‘बेला’ और ‘नये पत्ते’ तक निराला जी का काव्य व्यंग्य हास्य और प्रयोग की धाराओं में प्रवाहित हुआ है। उनका अंतिम काव्य निर्माण शान्त रस की भूमिका पर चला है। भाषा के प्रयोग में भी अनेक परिवर्तन निराला जी ने किए हैं, यद्यपि उनकी एक शृंखला भी बनी हुई है। इन समस्त भिन्नताओं के रहते हुए निराला का काव्य वैशिष्ट्य किसी सूक्ष्मदर्शी समीक्षक द्वारा ही आकलित हो सकता है। प्रायः लोग उनकी सम्पूर्ण रचना का तारतम्य नहीं जान पाते। विविधता में एकता की पहचान नहीं हो पाती। श्री धनंजय वर्मा ने निराला काव्य के वैविध्य की छानबीन की है और उसके समन्वित आकलन का प्रयत्न भी किया है।’’ ‘‘संक्षेप में इस पुस्तक में निराला के काव्य वैशिष्ट्य को केन्द्र में रखकर उनकी विविध कृतियों की समीक्षा की गई है। इस कारण समीक्षा-पुस्तक में वस्तुमुखी साहित्यिक विवेचन के लिए अधिक अवकाश मिल सका है। पुस्तक में अब तक की समीक्षाओं का उपयोग करते हुए नये संतुलन और समाहार का उद्योग किया गया है। यही इस पुस्तक की प्रमुख विशेषता है।’’

एक नये लेखक की पहली पुस्तक, वह भी आलोचना की, उसका स्वागत भी खूब हुआ। अमृतसर हो या कोचिन, औरंगबाद-मुम्बई हो या पटना-कलकत्ता, विश्वविद्यालयीन परिसरों में विद्यार्थियों और प्रोफेसरों के बीच लेखक की पहचान ‘वही निराला वाले धनंजय’ रूप मेें हुई। 1965 में उसका दूसरा संशोधित संस्करण प्रकाशित हुआ। उसके लगभग पुनर्लेखन और नयी अतिरिक्त सामग्री के साथ ‘निराला-काव्य: पुनर्मूल्यांकन’ के नाम से वह 1973 में पुनः प्रकाशित हुई। कवि राजेन्द्र शर्मा के शब्दों में: ‘‘आज भी निराला की कविताओं के समझने के लिए वह एक सन्दर्भ ग्रन्थ की तरह उपयोग में आती है।’’

धनंजय वर्मा की दूसरी पुस्तक ‘आस्वाद के धरातल’, 1969 में प्रकाशित हुई। इसे उन्होंने ‘समकालीन रचना की सहयात्राएँ’ कहा है। इसमें आलोचना पहली बार एक ‘सहयोगी खोज’ के रूप में परिभाषित हुई। डाॅ. आरती दुबे के शब्दों में: ‘‘आलोचना को शास्त्रीयता के दायरे से निकलकर खुले आकाश में आने का मौका मिला, जहाँ आलोचना के कई आयाम विकसित हुए।’’ इसमें डाॅ. वर्मा के चिन्तन-परक लेख हैं- परम्परा एक यात्रा: रचना की प्रतिबद्धता, आस्था का दर्शन, सृजन की समस्याएँ, आधुनिक व्यक्ति: व्यक्ति की आधुनिकता। काव्य-प्रवृत्तियों और धाराओं पर लेख हैं: नयी कविता: कविता का नयापन, काव्य नाटक की अवधारणा, दुष्यन्त कुमार के काव्य-नाटक: एक कंठ विषपायी का विवेचन, गीत: नवगीत, तीसरा सप्तक और प्रयोगवाद। कवियों में निराला और महादेवी, माखनलाल चतुर्वेदी और मुक्तिबोध, उपेन्द्रनाथ अश्क और दुष्यन्त कुमार पर समीक्षा, प्रगतिवादी समीक्षा और परवर्ती परीक्षा के अन्तर्गत क्रमशः आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, डाॅ रामविलास शर्मा तथा अज्ञेय और पंत, शमशेर और नामवर सिंह, प्रभाकर माचवे और डाॅ. इन्द्रनाथ मदान के निराला सम्बन्धी मूल्यांकन का विवेचन है। महादेवी का गद्य के अलावा हिन्दी अपेक्षा और सम्भावना पर विचार-विमर्श है। साहित्यिक मुद्दों में पाठकों की पक्षधरता और साहित्य के मूल्य, रचनाकार, पाठक और समीक्षक, कविता के पाठक, युवालेखन का नेपथ्य: युवा आक्रोश, युवा लेखन: सही-गलत चेहरे पर बेबाक टिप्पणियाँ हैं। उपन्यास की रचना प्रक्रिया के साथ के.एम.मुंशी, उदयशंकर भट्ट, रांगेय राघव, नरेश मेहता ओर फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों पर लेख हैं। 1957 से 1969 तक की अवधि में लिखे हुए लेखों का यह संग्रह पर्याप्त चर्चित हुआ।

सागर विश्वविद्यालय में डाॅ. वर्मा के प्रोफेसर डाॅ. प्रेमशंकर ने इस पर लेख लिखा, जिसका अंतिम वाक्य है: ‘‘निश्चित ही समकालीन रचना की सही पहचान के रूप में यह धनंजय वर्मा का एक जीवन हस्ताक्षर है, नयी समीक्षा का एक नया प्रतिमान। डाॅ. सियाराम शरण प्रसाद ने ‘नई धारा (पटना) और डाॅ. राजानारायण मौर्य ने राष्ट्रवाणी (पुणे) में इस पर समीक्षा लेख लिखे और कल्पना (हैदराबाद) में भी इसकी समीक्षा हुई। मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद्, भोपाल ने इसे 1971 में आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी आलोचना पुरस्कार से सम्मानित किया। पुरस्कार के निर्णायकों में वरिष्ठ लेखक श्री अमृतलाल नागर ने इसे ‘समीक्षा साहित्य’ में एक नया प्रतिमान स्थापित करने वाली कृति कहा तो डाॅ. प्रेमशंकर ने ‘मौलिक चिंतन की जीवन्त कृति।’ 1980 में इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ।

1975 में उनकी पुस्तक ‘हस्तक्षेप’ आई। इसमें उन्होंने रचना के समकालीन सरोकारों की पड़ताल की है। ‘रचना संसार ओर यथार्थ’, परिवेश चेतना बना मूल्यचेतना, समकालीन रचना में स्वतंत्रता का अर्थ और क्रान्ति और साहित्य पर चिन्तनपरक लेखों के साथ धर्मवीर भारती की कविता, उनके वैचारिक, सामयिक और ललित निबन्धों की पुस्तकों के साथ उनकी कहानियों पर एक विवेचनात्मक लेख है। दूसरा सप्तक के कवि हरिनारायण व्यास की कविता पर लेख के साथ युवा कविता की बदलती मानसिकता का भी जाय़जा लिया गया है। आलोचना की रचनात्मकता और माक्र्सवादी आलोचना: एक पुनर्विचार के अलावा युवा लेखन के मूल्यांकन पर विचार-विमर्श है। कथा-आलोचना के अन्तर्गत ‘कहानी का रचना संसार’ के अलावा आज की कहानियाँ: सामाजिक चुनौतियाँ, समकालीन कहानी: सही आदमी की पहचान, कहानी का समकालीन परिदृश्य कहानी की मानसिकता, कहानी की वापसी और कहानी के बदलते तेवर के साथ यशपाल के उपन्यास ‘मेरी तेरी उसकी बात’ पर विस्तृत लेख है। रंग आलोचना के अन्तर्गत ‘रंगकर्म और दर्शक’ तथा संस्कृति आलोचना में ‘आधुनिकता और भारतीय संस्कृति’ पर विचार किया गया है। इसमें उनके तीन साक्षात्कार भी शामिल हैं: आस्वाद के धरातल और आलोचना की अन्तर्यात्रा, व्यवस्था: विरोधांे की राजनीति और समसामयिक लेखन: एक अनौपचारिक बातचीत।

‘हस्तक्षेप’ का भी अच्छा स्वागत हुआ। प्रख्यात आलोचक डाॅ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय ने इस पर एक समीक्षा लेख लिखा जिसमें डाॅ. वर्मा के ‘‘आलोचक की विश्व-दृष्टि और प्रखर सामाजिक चेतना को रेखांकित करते हुए निष्कर्षतः कहा गया कि ‘‘हिन्दी-साहित्य में आजकल जो अबौद्धिकता, सिद्धान्तहीन दलबन्दी और दलदल फैला हुआ है, उसमें धनंजय का यह ‘हस्तक्षेप’ स्वागत योग्य है।’’ डाॅ. रणवीर रांग्रा को इसमें ‘रचना की आत्मा तक पहुँचने की तड़प’ दिखी तो शक्तिपाल केवल को ‘आलोचना का एक नया आयाम’ मिला। डाॅ. सियारामशरण प्रसाद ने इसमें ‘एक सजग कलाकार की दृष्टि रेखांकित की।’ यह उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 1976 में पुरस्कृत हुुई और 1979 में इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ।

तीन वर्ष बाद 1978 में ‘आलोचना की रचना यात्रा’ का प्रकाशन हुआ। इसमें रचना और आलोचना के रिश्तों पर ‘हलफ़नामा’ के साथ समकालीन रचना के सरोकार, शब्द और शोर, साहित्य का रचना धर्म: मानवीय सौन्दर्य बोध, सामाजिक संघर्ष और परिवर्तन में साहित्य की मुमकिन भूमिका पर चिन्तन लेख है। ‘आधुनिक कवि में द्वंद्व’ के विश्लेषण के साथ ‘उपन्यास की हालत’ पर एक सौन्दर्यशास्त्रीय पड़ताल भी है। रेखा (भगवती चरण वर्मा) डूबते मस्तूल (नरेश मेहता) अन्धेरे बन्द कमरे (मोहन राकेश) एक इंच मुस्कान (राजेन्द्र यादव- मन्नू भण्डारी) टूटती इकाइयाँ (शरद देवड़ा) राजनीति और साहित्य के रिश्तों को सुभद्राकुमारी चैहान की कहानियों के माध्यम से विश्लेषित किया गया है। रंग आलोचना के अन्तर्गत रंगकर्म और दर्शक के आपसी रिश्ते, रंग दृष्टि: यथार्थ के रचना बिम्ब, रंग चेष्टा: समकालीन अनुभव की शक्ल, समकालीन रंग अनुभव: तलाश के मुहावरे, रंगकर्म: व्यवस्था से मुक्ति की खोज, समकालीन रंगकर्म निर्देशक की भूमिका का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। इनके अलावा समकालीन कला: आधुनिकतावाद बनाम जातीय पहचान शीर्षक चित्रकला समीक्षा और ‘संस्कृति के प्रतिगामी चेहरे’ तथा ‘आधुनिकता और गाँधी की प्रासंगिकता’ पर संस्कृति-सभ्यता समीक्षा सम्बन्धी लेख भी सम्मिलित हैं। डाॅ. इन्दु प्रकाश कानूनगो ने इस पर एक लम्बा लेख ‘मध्यभूमि’ में लिखा।

और फिर आया मनोज कुमार श्रीवास्तव के शब्दों में: ‘हिन्दी की समकालीन समीक्षा में आधुनिकता का वृहत्तम विमर्श’, ‘आधुनिकता और हिन्दी नया काव्य’, पुस्तकत्रयी - आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय (1984) आधुनिकता के प्रतिरूप (1986) और समावेशी आधुनिकता (1991) के रूप में। ये तीनों पुस्तकें अपने-आपमें स्वतंत्र हैं, लेकिन तीनों मिलकर एक समग्र-सम्पूर्ण की रचना भी करती है। ये दरअसल ‘आधुनिकता के सन्दर्भ में छायावादोत्तर हिन्दी काव्य का अनुशीलन’ विषय पर डाॅ. धनंजय वर्मा की पीएच.डी. की थीसिस से पुनर्संस्कृत हैं। डिमाई आकार के लगभग नौ सौ पृष्ठों की इन तीन पुस्तकों की मूल योजना ही महत्त्वांकाक्षी थी और डाॅ. वर्मा इस पर सन् 1966 से ही काम कर रहे थे। वह सम्पन्न हुई सागर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की टीचर फेलोशिप - 1977 से 1980 के दौरान।

इसकी पहली पुस्तक ‘आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय’ में सचमुच तीन ही अध्याय हैं। पहला है- आधुनिकता का अवधारणात्मक विकास, दूसरा है- आधुनिकता के अन्तर्राष्ट्रीय रचना- सन्दर्भ और तीसरा है- आधुनिकीकरण: भारतीय सन्दर्भ और हिन्दी चिन्तन। इसके बारे में डाॅ. हरदयाल ने कहा है कि ‘इन तीनों अध्यायों को आधुनिकता सम्बन्धी अवधारणाओं का विश्वकोश कहा जा सकता है’ और डाॅ. रमेश दवे कहते हैं: ‘‘यह विवेचन इतना सन्दर्भ सम्पन्न और आलोचना प्रगल्भ है कि लगता है- जैसे हम काव्य-आलोचना के साथ-साथ आधुनिक कविता के एक सन्दर्भ ग्रन्थ से या लघु ‘एनसायक्लोपीडिया’ से साक्षात्कार कर रहे हैं।’’ दूसरी पुस्तक है- आधुनिकता के प्रतिरूप। इसका पहला अध्याय है- आधुनिकता के सन्दर्भ में छायावाद। पाश्चात्य-यूरोपीय, अंग्रेज़ी कविता की ‘एण्टी रोमान्टिक आधुनिकता’ की अवधारणा के बरअक्स हिन्दी कविता में आधुनिकता का प्रवेश छायावाद से ही हुआ इसीलिए उन्होंने प्रसाद और निराला एवं पंत और महादेवी का पुनर्मूल्यांकन किया है। दूसरा अध्याय है- छायावाद का उत्तर-राग। वस्तुतः डाॅ. वर्मा ने छायावाद से शुरू हुए आधुनिक हिन्दी काव्य-संचरण को इन सारणियों में विश्लेषित और मूल्यांकित किया है:

(क) छायावाद का उत्तर राग (ख) उत्तर-छायावादी संक्रान्तिकालीन काव्य (ग) व्यक्तिवादी-रूपवादी काव्य (घ) सामाजिक प्रतीति और प्रासंगिकता का काव्य (ड़) समावेशी रचनात्मकता का काव्य।

इसीलिए छायावाद का उत्तर-राग में माखनलाल चतुर्वेदी ‘एक भारतीय आत्मा’ और बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का पुनर्मूल्यांकन है, तीसरे अध्याय:उत्तर-छायावादी संक्रान्तिकालीन काव्य: के अन्तर्गत हरिवंश राय ‘बच्चन’ और रामधारीसिंह ‘दिनकर’ के काव्य का विस्तृत विश्लेषण और मूल्यांकन है।

चैथे अध्याय में व्यक्तिवादी और रूपवादी काव्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ उसकी मूल्य-चेतना, काव्य-दर्शन और रचना सरगम का विस्तृत विश्लेषण है। पाँचवें अध्याय में व्यक्तिवादी रूपवादी काव्य के प्रतिनिधि कवि अज्ञेय के समग्र-काव्य का विश्लेषण और मूल्यांकन है। छठवें अध्याय में इस काव्यधारा के दूसरे प्रमुख कवि धर्मवीर भारती के समग्र काव्य का विश्लेषण और मूल्यांकन है। सातवें अध्याय में निष्कर्षतः डाॅ. वर्मा की मान्यता है कि अज्ञेय और भारती का काव्य समसामयिक और आधुनिक होता हुआ भी आधुनिकता की समग्र चेतना से वंचित है।

तीसरी पुस्तक है- ‘समावेशी आधुनिकता’ इसके पहले अध्याय में सामाजिक प्रतीति और प्रासंगिकता के सन्दर्भ में आधुनिकता को परिभाषित किया गया है। इसी पृष्ठभूमि में दूसरे अध्याय में आधुनिकता के देशज संस्कारों के प्रतीक पुरुष नागार्जुन के समग्र काव्य का मूल्यांकन है। तीसरे अध्याय में क्रान्तिकारी स्वच्छन्दतावाद की आधुनिकता को रूपायित करने वाले कवि डाॅ. शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ के पूरे काव्य का विश्लेषण है। निषेध का निषेध आधुनिकता को रेखांकित करने के पश्चात् चैथे अध्याय में समावेशी रचनात्मकता के काव्य की आधुनिकता की विस्तृत मीमंासा है। पाँचवें अध्याय में आधुनिकता की संकल्पधर्मी चेतना के प्रतीक और प्रतिनिधि कवि गजानन माधव मुक्तिबोध के काव्य का मूल्यांकन किया गया है। छठवें अध्याय में आधुनिकता के समावेशी चरित्र को रूपायित करने वाले कवि शमशेर बहादुर सिंह के काव्य का विश्लेषण और मूल्यांकन है। सातवें अध्याय में समकालीन मानव स्थिति का समग्र साक्षात्कार करती आधुनिकता का विश्लेषण है और अंत में पूरी पुस्तक-त्रयी का समाहार प्रगतिशील और समावेशी आधुनिकता के पुनरावलोकन से होता है।

आधुनिकता और हिन्दी के नये काव्य के इस पूरे काव्य-विमर्श याने पुस्तक-त्रयी के बारे में डाॅ. कमला प्रसाद कहते हैं: ‘‘मुझे नहीं लगता कि आधुनिकता में अंतर्निहित विभिन्न धाराओं और प्रवृत्तियों के बारे में इतनी समग्र पड़ताल हिन्दी में और कहीं उपलब्ध है।’’ आधुनिकता के प्रतिरूप के बारे में डाॅ. हरदयाल कहते हैं: ‘‘धनंजय वर्मा द्वारा किये गये पुनर्मूल्यांकन से हम सहमत हों या न हों, किन्तु वह विचारोत्तेजक अवश्य है।’’ डाॅ. राजेन्द्र कुमार कहते हैं: ‘‘आधुनिकता और आधुनिकवाद के प्रत्ययों की कई व्यापक (प्रचलित और छूटे हुए भी) पक्षों से जाँचने-परखने के लिए किए गए प्रयासों में, जहाँ तक मेरी जानकारी है, सर्वाधिक व्यवस्थित प्रयास है डाॅ. धनंजय वर्मा का।’’ डाॅ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय कहते हैं: ‘‘इससे लेखकों आलोचकों के मस्तिष्क में बने-बनाये ढ़ाँचे टूटेंगे ओर आधुनिकता, समसामयिकता आदि के विषय में पुनर्विचार करना होगा।’’ डाॅ. रमेश कुंतल मेघ कहते हैं: ‘‘सर्वत्र आलोचक की मौलिक कुशलता, अध्ययनशीलता की उम्दा तथा उत्तम छाप है।’’ डाॅ. ए. अरविंदाक्षन कहते हैं: ‘‘धनंजय वर्मा की समावेशी आधुनिकता सम्बन्धी अवधारणा एवं कविता के विश्लेषण के कारक तत्त्व दरअसल भविष्य के समीक्षकों के लिए विचारशील पीठिका तैयार करते हैं। उनकी अवधारणा में देशज आधुनिकता के बीच तत्त्व बिखरे पड़े हैं।’’

इसके बाद आई डाॅ. धनंजय वर्मा की कथा-आलोचना की पुस्तक-त्रयी: हिन्दी कहानी का रचना शास्त्र (1998) हिन्दी कहानी का सफ़रनामा (2001) और हिन्दी उपन्यास का पुनरावतरण (2003)। कथा-आलोचना में डाॅ. वर्मा का नाम ‘नयी कहानी’ आन्दोलन के साथ बहुत सीधे बहुत सीधे रूप में जुड़ा। ‘नया उपन्यास’ पर उनका पहला लेख ‘आलोचना के अक्टूबर 1957 में और ‘नयी कहानी’ पर उनका पहला लेख ‘नई धारा’ के जनवरी 1958 अंक में छपा था। तब से लेकर पूरे पाँच-छह दशक तक फैली उनकी कथा-आलोचना ने समकालीन हिन्दी कहानी और उपन्यास की लगभग हर उल्लेखनीय हलचल, रचना और रचनाकार को चिह्नित और केन्द्रित किया, उनका विवेचन और मूल्यांकन किया। ‘हिन्दी कहानी का रचनाशास्त्र’ में ‘परिप्रेक्ष्य’ के अन्तर्गत कहानी की रचना-प्रक्रिया, कहानी और यथार्थ की अन्तक्र्रिया, कहानी में परिवेश की विकल्प-चेतना, कहानी की वर्तमानता और व्यंग्य की रचनात्मकता-पाँच लेखों में उनका कहानी सम्बन्धी सैद्धान्तिक और मूल्यपरक चिन्तन स्पष्ट होता है। कहानी-आलोचना के प्रतिमान स्थिर करने की दिशा में उन्होंने अपनी समकालीन कहानी आलोचना के परीक्षण करते हुए पाँच लेख लिखे हैं: ‘‘नयी कहानी की समीक्षा: आहत,आक्रोश और आक्रांत भविष्य-दृष्टा, कहानी: अच्छी और नयी: पाठ्य प्रक्रिया के प्रतिमान, कहानी-समीक्षा: एक सहयोगी प्रयास का पुनरावलोकन, हिन्दी कहानी: आलोचना के प्रवर्तक: पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी। इस पुस्तक का केन्द्रीय आलेख है: कहानी का रचना-शास्त्र: एक प्रस्तावना। इसमें कहानी के सौन्दर्य शास्त्रीय आग्रह से बचाकर एक रचनाशास्त्र प्रस्तुत किया गया है। ‘प्रत्याख्यान’ के अन्तर्गत ‘नयी कहानी’ के सन्दर्भ में पीढ़ियों का संघर्ष, प्रवाद और प्रगति, तात्कालिक परम्परा का प्रश्न, प्रेम का बदलता स्वरूप, नयी कहानी बनाम नयी कविता, कहानी: आन्दोलन की राजनीति और वर्ग संघर्ष तथा संचेत कहानी: आत्म प्रतिष्ठा आदि मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया है। इनसे तत्कालीन कहानी-चर्चा का परिदृश्य उभरता है। ‘परिधि’ के अन्तर्गत नयी कहानी के स्वरूप को स्पष्ट करने वाली बहुआयामी व्याख्या प्रस्तुत करने वाले लेख हैं। नयी कहानी: एक संश्लिष्ट रचना-रूप, नयी कहानी: कथ्य और सम्प्रेषण, नयी कहानी का संचरण, नयी कहानी का समग्र-बोध, नयी कहानी की सामाजिक अर्थवत्ता, नयी कहानी: अलग होना और लौटना, नयी कहानी: क्षेत्रीय यथार्थ और पक्षधरता, नयी कहानी: समग्र-सम्पूर्ण की चेतना युवा लेखन: कहानी: भीड़ में भीड़ से अलग। ‘परिदृश्य’ के अन्तर्गत समकालीन कहानी की रचना-प्रवृत्तियों और धाराओं का आनुक्रमिक आकलन करने वाले लेख हैं: कहानी: एक समानान्तर प्रतिसंसार, कहानी की प्रासंगिकता, समकालीन कहानी के चेहरे, समकालीन कहानी: जातीय संवेदना और सरोकार, समकालीन कहानी के चेहरे, समकालीन कहानी सम्बन्धों का बदलाव, समकालीन कहानी और पाठकीय रुचि ‘परिमिति’ के अन्तर्गत प्रेमचन्द और समकालीन कहानी के रिश्तों की पड़ताल करते हुए काल्पनिक साक्षात्कार के साथ-साथ कहानी: नयी कहानी एक पुनरावलोकन शीर्षक कवि कहानीकार राजेश जोशी से एक अंतरंग बातचीत है। कथा का रचनाशास्त्र पर डाॅ. लक्ष्मण सहाय की प्रश्नावली के उत्तरों के साथ कहानी: रहस्य और रोमांच तथा हिन्दी विज्ञान कथा शीर्षक दो आलेख भी हैं।

दूसरी पुस्तक: ‘हिन्दी कहानी का सफ़रनामा’ (2001) मुख्य रूप से समकालीन कहानी के प्रमुख रचनाकारों और उनकी कहानी-कला का विस्तृत विश्लेषण और लेखा-जोखा है। जैनेन्द्र कुमार से लेकर शशांक तक लगभग सत्तर लेखकों के एकाधिक कहानी-संग्रहों की कहानियों का विवेचन और मूल्यांकन प्रस्तुत करती यह पुस्तक समकालीन कहानी का इतिवृत्त है। नयी कहानी की उपलब्धियों में एक दर्ज़न कहानियों का विवेचन है। इसके साथ ही सुभद्राकुमारी चैहान, अमृतराय, मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, मार्कण्डेय, शानी, रमेश बक्षी और ओमप्रकाश मेहरा पर विशेष आलेख हैं।

तीसरी पुस्तक है: ‘हिन्दी उपन्यास का पुनरावतरण’ (2003) इसमें उपन्यास के सूरते-हाल, भारतीय उपन्यास की अवधारणा और उपन्यास की रचना प्रक्रिया, प्रेमचन्द से लेकर रमेश बक्षी तक हिन्दी उपन्यास की यात्रा पर एक लम्बे आलेख के अलावा जिन प्रमुख उपन्यासकारों पर स्वत़ंत्र लेख हैं- वे हैं: प्रेमचन्द, फणीश्वरनाथ रेणु , कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, वृन्दावनलाल वर्मा, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा, उदय शंकर भट्ट, रांगेय राघव, अमृतराय, नरेश मेहता, शानी, दुष्यन्त कुमार, शिवप्रसाद सिंह, रमेश बक्षी, मंजूर एहतेशाम और सत्येन कुमार। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के कथ्य पर केन्द्रित छह उपन्यासों के विस्तृत विश्लेषण के अलावा जैनेन्द्र कुमार और अमृतलाल नागर से लेकर मनहर चैहान तक के इकतीस उपन्यासकारों और उनके उपन्यासों पर भी टिप्पणियाँ हैं। इस तरह आधुनिक और समकालीन हिन्दी उपन्यास की लगभग हर गतिविधि और उल्लेखनीय उपन्यासकार का जायज़ा लेती यह पुस्तक हिन्दी में उपन्यास के पुनर्संस्कार का इतिहास प्रस्तुत करती है।

डाॅ. धनंजय वर्मा की इस विस्तृत कथा-आलोचना की खूब चर्चा हुआ। वरिष्ठ लेखकों में यशपाल और उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’, वीरेन्द्र कुमार जैन और डाॅ. देवराज, समकालीन लेखकों मेें हरिशंकर परसाई और रवीन्द्रनाथ त्यागी से लेकर युवा लेखक प्रणवकुमार बंद्योपाध्याय और मधुकर सिंह ने उनकी कथा-आलोचना को सराहा तो मधुरेश और राजेश जोशी, डाॅ. नरेन्द्र मिश्र, डाॅ. शोभन जोशी, डाॅ. सेवाराम त्रिपाठी और विजय कुमार देव ने उनकी कथा-आलोचना पर मूल्यांकनपरक लेख लिखे।

डाॅ. धनंजय वर्मा की एक बहुचर्चित पुस्तक ‘हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन’ वर्ष 2000 में प्रकाशित हुई। समकालीन साहित्य और संस्कृति की इन अन्तर्कथाओं में सत्ता और संस्कृति के रिश्तों से लेकर पुरस्कारों और सम्मानों की राजनीति, साजिशें और जोड़-तोड़ की नेपथ्य कथाओं का प्रामाणिक अनुभव और भोगा हुआ यथार्थ इनमें व्यक्त हुआ है। डाॅ. वर्मा ने दो वर्ष मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग में विशेष कत्र्तव्यस्थ अधिकारी और लगभग पाँच वर्ष मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन में साहित्य मंत्री एवं महामंत्री के रूप में साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में दिए जाने वाले पुरस्कारों एवं सम्मानों की कार्यवाही का कार्यभार संभाला था। उसी दौर के अनेक रहस्यउद्घाटन और दुरभिसन्धियों को उजागर करती इस पुस्तक की खूब चर्चा हुई। कवि विजेन्द्र एवं प्रमोद सिन्हा, डाॅ. गंगाप्रसाद गुप्त एवं डाॅ. प्रभुदयाल मिश्र द्वारा मुक्त कंठ से सराही गयी इस पुस्तक पर युगेश शर्मा ने एक लम्बा प्रशंसात्मक लेख भी लिखा।

कथा आलोचना की उपर्युक्त पुस्तक-त्रयी के ही आनुषंग-क्रम में डाॅ. धनंजय वर्मा की एक पुस्तक ‘परिभाषित परसाई’ (2001) भी प्रकाशित हुई। यह श्री हरिशंकर परसाई की रचनात्मकता पर केन्द्रित है। इसमें कथाकार और व्यंग्यकार, निबन्धकार और स्तम्भकार परसाई की कहानियों का विश्लेषण है, उनके व्यंग्यों की सृृजनात्मक पहचान है, उनके काॅलम-लेखन के मूल्यांकन के लिए एक नये सौन्दर्यशास्त्र की ज़रूरत का रेखांकन है, हिन्दी के जातीय गद्य की परम्परा में परसाई के निबन्धों की अहमियत का आख्यान है और परसाई की साहित्यिक हैसियत का बखान है। परसाई के व्यक्तिगत पत्रों के माध्यम से उनके व्यक्तित्व का एक प्रामाणिक साक्ष्य और उनके अन्तर्मन को समझने का एक रचनात्मक उद्यम है। ललित सुरजन एवं प्रेम जनमेजय, डाॅ. रमाकान्त श्रीवास्तव और डाॅ. श्याम कश्यप द्वारा प्रशंसित इस पुस्तक पर माताचरण मिश्र का एक लेख भी प्रकाशित हुआ।

उनकी एक पुस्तक ‘आलोचना के सरोकार’ वर्ष 2003 में प्रकाशित हुई। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सत्ता और प्रतिष्ठान, रचना-प्रक्रिया में व्यक्तित्व की भूमिका, यथार्थवाद बनाम रूपवाद और आधुनिक हिन्दी कविता के भारतीय सन्दर्भ शीर्षक चिन्तनपरक लेखों के साथ इसमें डाॅ. वर्मा का संस्कृति-आलोचना विषयक एक अत्यन्त विवादास्पद और चर्चित लेख है: ‘किन नींदों अब तू सोती है।’ हिन्दी आलोचना पर इसमें एक विशेष खण्ड है जिसमें आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पर पाँच आलेखों के अलावा आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, डाॅ. रामविलास शर्मा, डाॅ. देवराज, अमृतराय और डाॅ. प्रेमशंकर की आलोचना का मूल्यांकन भी किया गया है। बांग्ला काव्य और बांग्ला रंगमंच और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साथ पाब्लो नेरूदा और शोलोखोव के अलावा उर्दू शायर ताज भोपाली और फजल ताबिश पर भी लेख हैं। कवि लाल जगदलपुरी, विजयदेव नारायण साही, दुष्यन्त कुमार ओर कथाकार शानी की रचना-जीवन-यात्रा पर विस्तृत आलेखों के अलावा विष्णु खरे, जितेन्द्र कुमार और ज्ञानेन्द्रपति की कविताओं पर टिप्पणियाँ हैं। ‘भाषा के अवमूल्यन’ पर हुए संवाद पर एक प्रत्यालोचना भी इसमें शामिल है। इस पुस्तक को केन्द्र में रखकर डाॅ. कमला प्रसाद ने ‘डाॅ. धनंजय वर्मा की आलोचना के कुछ पहलू ‘शीर्षक एक मूल्यांकनपरक लेख लिया है। कमला प्रसाद चैरसिया ने भी ‘आलोचना के सरोकार बनाम प्रतिपक्ष के प्रहार’ शीर्षक एक विवेचनात्मक लेख लिखकर इस पुस्तक की महत्ता प्रतिपादित की है।

2003 में ही डाॅ. वर्मा की एक और पुस्तक भी प्रकाशित हुई- ‘लेखक की आजादी’। इसमें सैद्धान्तिक और साहित्यिक, दार्शनिक और चिन्तनपरक विचारों को आम पाठकों तक पहुँचाने के लिए संक्षिप्त और अपेक्षाकृत सरल भाषा में लिखे गए छब्बीस आलेख संकलित हैं। संस्कृति की चिन्ता और साहित्यकार के आत्मसंघर्ष से लेकर धर्म और राजनीति, कहानी और आलोचना, अनुवाद और बाल साहित्य, चित्रकला और पत्रकारिता, उर्दू काव्य और स्त्री-विमर्श तक इनका विचार-फलक पर्याप्त व्यापक और विविध स्तरीय है। दरअसल ये आलेख मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ‘विचार आलेख सेवा’ के अन्तर्गत हिन्दी समाचार पत्रों में प्रकाशन के लिये लिखे गये हैं। इस सेवा के एक सम्पादक स्वयं डाॅ. वर्मा थे। इसी तरह के चैबीस आलेखों का एक संग्रह ‘आलोचना की ज़रूरत’ 2005 में भी प्रकाशित हुआ। इन आलेखों को देश भर के समाचार पत्रों ने प्रकाशित किया था। इनका महत्त्व इसी बात से स्पष्ट है कि सूर्यकान्त नागर की ‘साहित्य और संस्कृति पर दार्शनिक चिंतन’ शीर्षक एक समीक्षा’ ‘नया ज्ञानोदय’ के अगस्त 2005 में प्रकाशित हुई और ‘कितना आज़ाद है लेखक’ शीर्षक एक लेख भी नागर जी ने लिखा। डाॅ. संजय जैन ने भी अपने लेख ‘परिवेश को आँकती कबीर-दृष्टि में इनकी महत्ता प्रतिपादित की।

डाॅ. वर्मा की एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘परम अभिव्यक्ति की खोज’ 2004 में प्रकाशित हुई। यह मुक्तिबोध के काव्य का पुनर्मूल्यांकन है। मुक्तिबोध पर अब तक प्रकाशित पुस्तकों में यह सबसे अलग और अन्यतम है। इसके कई आलेख तब लिखे गये थे जब साहित्य की राजनीति के चलते मुक्तिबोध को अपने-अपने शिविर में खींच लेने की एक होड़-सी मच गयी थी। परिणामस्वरूप आलोचना के धु्रवान्तों और व्याख्याओं के स्वेच्छाचार से मुक्तिबोध के काव्य की सही पहचान ही खो गयी। डाॅ. वर्मा ने इस पुस्तक में विविध भाष्यों और अन्तर्विरोधी व्याख्याओं के कुहासे, को हटाकर मुक्तिबोध के काव्य का पुनर्मूल्यांकन किया है। ‘लांग नाइन्टीज’ के सबसे महत्त्वपूर्ण कवि श्री लीलाधर मण्डलोई इसे डाॅ. वर्मा का आलोचना के प्रसंग में एक ‘एपीकल कर्म’ कहते हैं और अपने लेख का समापन इन शब्दों में करते हैं: ‘इस कृति को आलोचना के सन्दर्भ में अब तक की सर्वश्रेष्ठ किताबों में शुमार किया जाना चाहिए, क्योंकि अभिव्यक्ति के खतरे उठाने और मठों-गढ़ों को तोड़ने का काम भी यह किताब बखूबी करती है। मुक्तिबोध पर इससे बेहतर कोई आलोचनात्मक ‘ट्रिब्यूट’ नहीं हो सकता।

2005 में डाॅ. वर्मा की एक और पुस्तक प्रकाशित हुई: ‘आलोचना का अंतरंग!’ इसमें उनसे लिए गए साक्षात्कार, भेंटवार्ताएँ, संवाद और बातचीत संकलित हैं। तीस लेखकों और पत्रकारों, सम्पादकों और शोधार्थियों ने उनसे विविध विषयों पर चार सौ पैंतीस प्रश्न पूछे हैं, जिनके उत्तर वर्मा जी ने विस्तार से दिए हैं। साहित्य के सैद्धान्तिक मुद्दों से लेकर व्यावहारिक आलोचना, शिक्षा और संस्कृति, व्यवस्था और राजनीति, संविधान और पत्रकारिता अर्थात् सभ्यता और संस्कृति के समकालीन परिदृश्य पर उन्होंने बहुआयामी और अनेक स्तरीय विचार-विमर्श किया है। इस विचारोत्तेजक विमर्श ने बुद्धिजीवियों और पाठकों में तीव्र और त्वरित प्रतिक्रियाओं का संचार किया। उनका उत्कट विरोध हुआ या फिर उन्हें अनायास समर्थन मिला। समकालीन भारतीय साहित्य के अंक 133 (सितम्बर-अक्टूबर 2007) में डाॅ. पल्लव ने लिखा: अपनी मान्यताओं और स्थापनाओं को लेकर यहाँ आलोचक की दृढ़ता स्वागत योग्य है, वहीं इन साक्षात्कारों में तत्कालीन परिदृश्य भी खासा निकलकर आया है।....औपचारिक-अनौपचारिक इन बातचीतों से आलोचक धनंजय वर्मा का व्यक्तित्व और उनके विचार पाठक के समक्ष खुले हैं, गंभीर मुद्दों पर भी पठनीयता में कोई अवरोध नहीं।’’ और प्रभुनाथ सिंह आज़मी लिखते हैं: ‘‘धनंजय वर्मा की बातचीत जितनी सुचिंतित है, उतनी ही सटीक और स्पष्ट। अपनी सोच और विवेचना को एक व्यवस्थित ढ़ंग से व्याख्या के शीर्ष तक ले जाते हैं, जैसे आप सीढ़ियाँ चढ़ रहे हैं।’’

वर्ष 2009 में डाॅ. वर्मा की एक पुस्तक हुई: ‘एक आवाज़: सबसे अलग’। समकालीन हिन्दी कविता के एक महत्त्वपूर्ण कवि दुष्यन्त कुमार त्यागी की समग्र रचनाशीलता की पड़ताल करने वाली इस पुस्तक में दुष्यन्त कुमार की कविता, उनके काव्य नाटक, उनके उपन्यास और रचना-व्यक्तित्व के अंतरंग साक्षात्कार करने वाले उनके पत्रों की नेपथ्य कथाएँ भी शामिल हैं। विजय कुमार देव के शब्दों में: ‘‘समग्रता में यह पुस्तक दुष्यन्त की रचना-यात्रा को उजागर करने के लिए पर्याप्त है। यहाँ हम उन पड़ावों से साक्षात्कार करते हैं जिनसे गुजरकर दुष्यन्त की आवाज़ हमें सबसे अलग और सबसे भारी लगती है।’’

वर्ष 2013 में डाॅ. वर्मा की एक पुस्तक ‘साझी विरासत’: (उर्दू काव्य विमर्श) प्रकाशित हुई। इसमें उर्दू के ऐसे क्लासिक शायरों की जीवन-रचना-यात्रा का विवरण है, जिन्होंने अपनी ‘साझी विरासत’ की न केवल नींव डाली, बल्कि उसे मजबूत और समृद्ध किया। अमीर खुसरो से शुरू कर मीर तक़ी मीर, असद-उल्लाह- खाँ ग़ालिब, रघुपति सहाय, फ़िराक़ गोरखपुरी और फै़ज़ अहमद फै़ज़ तक अपनी उस शानदार परम्परा का यह पुनरावलोकन है जिसने इतिहास के सबसे अमानवीय उपद्रवों और देश-विभाजन के बावजूद बनाये रखा है। यह पूरी लेख माला ‘समावर्तन’ में अप्रैल 2010 से फरवरी 2011 तक प्रकाशित हुई थी। ‘समावर्तन’ के सम्पादक डाॅ. प्रभात कुमार भट्टाचार्य के शब्दों में: ‘‘इन लेखों की लोगों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की, पाठकों ने उन्हें सर-आँखों पर बिठाया।’’

वर्ष 2013 में ही उनकी एक और पुस्तक ‘आलोचना के आयाम’ भी प्रकाशित हुई। इसमें दिक्-काल की अवधारणा पर चिन्तनपरक लेख के अलावा डाॅ. प्रभात कुमार भट्टाचार्य की काव्य-नाटक-त्रयी (मुक्ति कथा) पर एक लम्बा लेख है। गाँधी के राम, अस्पृश्यता निवारण का गाँधी मार्ग, ऋग्वेद और आर्यों का आदि देश सरीखे लेखों के साथ कवि स्वदेश भारती, लाला जगदलपुरी, महेन्द्र गगन और बहादुर पटेल की कविता की मीमांसाएँ हैं। उपन्यासकार नासिरा शर्मा और कहानीकार प्रभुनाथ सिंह आजमी तथा सुबोध कुमार पर लेखों के अलावा इसमें पाँच साक्षात्कार भी हैं। कवि-कथाकार लक्ष्मी नारायण पयोधि और जयप्रकाश मानस, पत्रकार सुधीर मिश्र और रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति के साथ शोधार्थी साधना त्यागी का लगभग अस्सी प्रश्न के उत्तरों के माध्यम से इनमें आलोचना की रचना-प्रक्रिया, मानक आलोचना, हिन्दी आलोचना के समकालीन परिदृश्य, साम्प्रदायिकता, आतंकवाद, भू-मण्डलीकरण, बाजारवाद आदि पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया है।

प्रसंगवश, यहाँ डाॅ. धनंजय वर्मा के आलोचना कर्म अब तक लिखे गये और प्रकाशित साहित्य का उल्लेख करना उचित होगा। सबसे पहले श्रीमती शेाभना जोशी ने ‘आलोचक धनंजय वर्मा’ शीर्षक लघु-शोध-प्रबन्ध भोपाल विश्वविद्यालय में 1984 में प्रस्तुत किया। कुमारी मंजू जैन का लघु-शोध-प्रबन्ध ‘धनंजय वर्मा: व्यक्तित्व और कृतित्व बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल में 1993 में प्रस्तुत हुआ। बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय से ही 2008 में डाॅ. विनय षडंगी राजाराम के निर्देशन में ‘समकालीन हिन्दी आलोचना में डाॅ. धनंजय वर्मा का योगदान’ पर डाॅ. नीता व्यास और डाॅ. नरेन्द्र मिश्र के निर्देशन में श्रीमती सरिता राय के शोध-प्रबन्ध: ‘धनंजय वर्मा का आलोचना संसार’ पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त हो चुकी है।

डाॅ. धनंजय वर्मा के रचना और आलोचना कर्म पर एकाग्र एक पुस्तक ‘शिलाओं पर तराशे मज़मून कवि विश्वरंजन ने सम्पादित की है। डाॅ. आरती दुबे, डी.लिट्. ने ‘आलोचना के शिखर पुरुष: डाॅ. धनंजय वर्मा’ का सम्पादन किया है। दोनों पुस्तकें 2010 में प्रकाशित हुई हैं। ‘रिसर्च लिंक’ के सम्पादक-प्रकाशक डाॅ. रमेश सोनी और डाॅ. प्रभात कुमार भट्टाचार्य के ‘समावर्तन’ के सहयोग से डाॅ. प्रमोद त्रिवेदी के सम्पादन में ‘आलोचना के अमृत पुरुष: धनंजय वर्मा’ का प्रकाशन 2013 में हुआ।

पूरे पाँच साल के अंतराल के बाद डाॅ. धनंजय वर्मा से डाॅ. प्रमोद त्रिवेदी की एक लम्बी अंतरंग बातचीत ‘बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी’ प्रेरणा (त्रैमासिक) के ‘पचहत्तर पार सृजनरत रचनाकार’ शृंखला के अन्तर्गत ‘धनंजय वर्मा विशेष’ के रूप में जुलाई-सितम्बर 2018 के अंक में प्रकाशित हुई। इस बातचीत की शुरूआत तो हो चुकी थी 2013 में ही - ‘आलोचना के अमृत पुरुष: डाॅ. धनंजय वर्मा’ से। इसकी दूसरी क़िस्त प्रकाशित हुई ‘समावर्तन’ के जुलाई 2015 के ‘अस्सी धनंजय वर्ष’ अंक में। फिर तीसरी-चैथी-पाँचवीं क़िस्तें पूरी हुईं जुलाई 2017 में। एक सौ चालीस पृष्ठों में फैली इस बातचीत में धनंजय वर्मा की शख़्सियत, जीवन और उनके आलोचना कर्म पर प्रमोद जी ने खूब खुलकर पूरे एक सौ पाँच प्रश्न पूछे हैं और धनंजय जी ने भी उतने ही मुक्त होकर उनके उत्तर दिए हैं। इसके अलावा धनंजय वर्मा पर प्रमोद त्रिवेदी का एक अंतरंग आलेख ‘अकेले शुक्र तारे का हमसफ़र’ और प्रमोद त्रिवेदी पर धनंजय वर्मा का आलेख ‘मेरे हमनवा और हमदम’ भी इसमें शामिल है। बक़ौल धनंजय वर्मा, ‘‘पहले मेरे लिए उज्जैन का मतलब सिर्फ प्रभात (कुमार भट्टाचार्य) था, अब प्रमोद (त्रिवेदी) भी हो गया है। जब से प्रभात पर ‘समावर्तन’ के सम्पादन-समन्वयन का अतिरिक्त कार्यभार आया तब से ‘भी’ अक्सर ‘ही’ में तब्दील होने लगा है।’’ इसीलिए शायद उन्होंने प्रमोद जी को ‘ग़मख़्वार-ए-जान-ए दर्द मंद’ के रूप में याद किया है।

इस बातचीत की व्यापक प्रतिक्रियाएँ हुईं। ‘प्रेरणा’ के बाद के अंकों में ‘आपकी क़लम से’ स्तम्भ में बीस-पच्चीस लेखकों-पाठकों की विस्तृत प्रतिक्रियाएँ प्रकाशित हुईं। डाॅ. प्रभात कुमार भट्टाचार्य के दो लम्बे पत्र और एक लम्बा पत्र डाॅ. श्रीराम निवारिया (इटारसी) का भी मिला। ‘प्रेरणा’ (भोपाल) के सम्पादक श्री अरुण तिवारी ने अपने सम्पादकीय में इस बातचीत के बहाने धनंजय जी को स्नेह-सम्मान से याद किया।

2019 में डाॅ. धनंजय वर्मा की दो पुस्तकें प्रकाशित हुईं। पहली- ‘खुतूत से नुमायाँ हमदम’ (पत्रकथाएँ) जो ‘समावर्तन’ में मार्च 2013 से जुलाई 2016 तक धारावाहिक रूप से प्रकाशित हो चुकी थीं। डाॅ. धनंजय वर्मा ने अपने गुरु आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के 29 मई, 1957 को लिखे गए पत्र से लेकर अब तक उन्हें मिले साहित्यकारों के पत्रों को सहेज कर रखा है। बीसवीं सदी के शायद अंतिम वर्ष में मुम्बई से श्रीमती पुष्पा भारती का एक ख़त उन्हें मिला। वे धर्मवीर भारती के पत्रों का संकलन कर रही थीं। उनका आग्रह था कि वर्मा जी उन्हें लिखे गए भारती जी के पत्रों की प्रतियाँ (या इबारतें) उन्हें भिजवा दें। वर्मा जी ने वर्ण-अनुक्रम से सुरक्षित फाइलों से भारती जी के पत्र एकत्र किए और उनकी टंकित प्रतियाँ पुष्पा जी को भिजवा दीं। उन पत्रों से जुड़ी यादों, घटनाओं और प्रसंगों को क्रमानुसार शब्दबद्ध करके उन्होंने एक आलेख तैयार किया- ‘खुतूत से नुमायाँ धर्मवीर भारती’। उसे उन्होंने ‘पश्यन्ती’ के सम्पादक श्री प्रवीण कुमार बन्द्योपाध्याय को भिजवा दिया। अप्रैल-जून 2000 की ‘पश्यन्ती’ में वह प्रकाशित हो गया।

27 अपै्रल, 2000 को दिल्ली से कथाकार श्रीमती चित्रा मुद्गल ने अपने पत्र में लिखा: ‘पश्यन्ती’ में अभी पढ़ा है - डाॅ. साहब से सम्बन्धित आलेख- ‘खुतूत से नुमायाँ भारती’। आँखें नम हैं और सब कुछ ठहर गया है जैसे उनकी स्मृति में। पत्र तो बहुतों के बहुत बार छपे और उन्हें पढ़ा भी है - दो विचारकों के बीच संवाद की तरह, लेकिन आपने जिस तरह पत्रों के माध्यम से व्यक्ति के प्रचलित व्यक्तित्व और शब्द व्यक्तित्व का तुलनात्मक रूप अन्वेषित किया है, दुर्भाव को फींच-निचोड़कर, वह छू गया, बल्कि कहूँ सर्जना की एक अनूठी विधा निकलकर सामने आई है। आप कई महत्त्वपूर्ण सर्जकों से हुए पत्र-संवाद को इसी रूप में लिखकर एक रोचक पुस्तक तैयार कर सकते हैं। - ‘खुतूत से नुमायाँ सर्जक।’

और पुष्पा भारती जी ने मुम्बई से अपने 25 जुलाई, 2000 के पत्र में लिखा: ‘‘भारती जी के पत्र बहुतों ने सहेज कर रखे हैं, किन्तु आपने एक-एक पत्र से सम्बन्धित स्मृतियों को जिस तरह मन में सहेजा और फिर उसे सिलसिलेवार अभिव्यक्ति दी, वह तो सचमुच एक अनूठी और निराली सृजनशीलता का प्रमाण है। संस्मरण और डायरी शैली का मिला-जुला अनोखा रूप-एकदम मौलिक और अद्भुत है। इस सूझ-बूझ के लिए बधाई! हिन्दी-साहित्य और साहित्यकारों से आत्मीयता से प्रेम करने वाले पाठकों को इस तरह की चीज़ें निश्चित रूप से पसंद आएँगी। आपने एक नया ही रास्ता दिखाया है।’’

पुष्पा जी ने ‘खुतूत से नुमायाँ धर्मवीर भारती’ में ‘एक अनूठी और निराली सृजनशीलता’ देखी - ‘एकदम मौलिक और अद्भुत’ तो चित्रा जी को उसमें ‘सर्जना की एक अनूठी विधा’ मिली। वर्मा जी ने उस विधा को नाम दिया- ‘पत्र-कथा’। इस पत्रकथाओं के धारावाहिक प्रकाशन के लेखकों-पाठकों ने इन्हें खूब पसंद किया। ‘समावर्तन’ के लगभग हर अंक में पाठकों-लेखकों की ये प्रतिक्रियाएँ लगातार प्रकाशित होती रहीं। उरई (उत्तरप्रदेश) के डाॅ. रामशंकर द्विवेदी ने दो क़िस्तों में इन पर एक विस्तृत- बत्तीस पृष्ठों का - एक लेख लिखा। इन्हें पुस्तकाकार प्रकाशित करने का परामर्श भी दिया। ‘समावर्तन’ के संस्थापक-सम्पादन-समन्वयक डाॅ. प्रभात कुमार भट्टाचार्य ने इस सन्दर्भ में भरपूर सहयोग दिया। ‘समावर्तन’ के अक्षर-विन्यास के संयोजक श्री विवेक शर्मा ने भी खूब मदद की। उन्होंने ‘समावर्तन’ के मार्च 2013 से जुलाई 2013 तक के सारे अंकों से प्रकाशित सामग्री की डीवीडी (सीडीआर/पीडीएफ) के साथ उनकी ‘प्रिन्ट आउट’ प्रतियाँ उपलब्ध करवा दीं।

भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक और ‘नया ज्ञानोदय’ के सम्पादक प्रख्यात कवि श्री लीलाधर मण्डलोई ने अपने 21 नवम्बर, 2016 के पत्र में लिखा: ‘‘आपकी किताब की हार्ड काॅपी मिल गई है। इसमें डीवीडी (सीडीआर/पीडीएफ) नहीं हैं। इसे कम्पोज़ करवाना होगा। बाद में प्रूफ के लिए भेजना होगा ताकि आपकी नज़र से शुद्ध हो जाए। यह काम 2017 के प्रकाशन वर्ष के लिए निर्धारित है। इसे हम मनोयोग के साथ प्रकाशित करना चाहेंगे।’’

2017 में जैन धर्म से सम्बन्धित पुस्तकों के लगातार प्रकाशन की वज़ह से यह पुस्तक प्रकाशित न हो पायी। फिर श्री मंडलोई जी भारतीय ज्ञानपीठ से मुक्त हो गए। नवम्बर 2018 मंें पुस्तक के फाइनल पू्रफ प्रकाशन अधिकारी श्री संजय दुबे ने ज़रूर भिजवाये जिन्हें आवश्यक सुधार निर्देश के साथ लौटा दिया गया, लेकिन पुस्तक का प्रकाशन स्थगित हो गया। नये निदेशक को पुस्तक के छह सौ पृष्ठ अधिक लगे। उन्होंने उसे ‘पत्र-संकलन’ समझकर उसमें से पत्र कम करने का फ़रमान जारी कर दिया। उनसे निवेदन किया गया कि वह पत्र-संकलन नहीं है, पत्रकथाओं की पुस्तक है। मंडलोई जी ने कृपापूर्वक हस्तक्षेप किया और अन्ततः नये निदेशक को मना लिया गया। अन्ततः दिसम्बर 2019 में पुस्तक प्रकाशित हो गयी, लेकिन ‘इनर टाइटिल’ और ‘प्रकाशन विवरण’ पृष्ठ पर इसे ‘पत्र-संकलन’ ही लिखा-छापा गया। ग़नीमत है कि इसके ‘पुरोवाक्’ में ‘एक नयी विधा-पत्रकथा’ - के आगाज़ की कहानी को ज्यों का त्यों रहने दिया गया। इसमें आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, यशपाल, उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’, अमृतराय, हरिनारायण व्यास, धर्मवीर भारती, हरिशंकर परसाई, मायाराम सुरजन, प्रभात कुमार भट्टाचार्य, विश्वम्भरनाथ उपाध्याय, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, दुष्यन्त कुमार, रवीन्द्रनाथ त्यागी, रमेश बक्षी, वीरेन्द्र कुमार जैन, राजी सेठ, प्रणव कुमार बन्द्योपाध्याय और सत्येन कुमार की पत्रकथाएँ हैं। नागार्जुन के पत्रों के आधार पर मेरा एक आलेख ‘मेरे नाना नागार्जुन’ भी इसमें शामिल किया गया है।

‘आलोचना के उत्तर अयन’ की पाण्डुलिपि जनवरी 2017 में साहित्य भण्डार, इलाहाबाद को भेजी गयी थी। पहले प्रूफ मिले दिसम्बर 2018 को और फाइनल पू्रफ भेजे गए मार्च 2019 में। इस बीच श्री सतीशचन्द्र अग्रवाल जी का दुःखद देहावसान हो गया। इसके बावजूद उनके सुपुत्र श्री विभोर अग्रवाल ने जनवरी 2020 में पुस्तक प्रकाशित कर दी। इसमें डाॅ. प्रभात कुमार भट्टाचार्य की सप्तखण्डीय काव्य-यात्रा पर एक विस्तृत आलेख ‘जीवन के महाराग की कविता’ (64 पृष्ठ) कविवर लीलाधर मण्डलोई के दस प्रकाशित काव्य-संग्रहों के आधार पर एक लम्बा लेख (54 पृष्ठ) ‘भाषा में मनुष्य रचता कवि’, दिनकर सोनवलकर और अनूप अशेष की कविताओं पर दो लेख, प्रमोद त्रिवेदी के उपन्यास ‘इस सराय में’ तथा परवेज़ अहमद के उपन्यास ‘ मिर्ज़ावाड़ी’ पर दो आलेख हैं। डाॅ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय और डाॅ. कृष्णदत्त पालीवाल के आलोचना कर्म का मूल्यांकन है। मुक्तिबोध और कृष्णा सोबती तथा दुष्यन्त कुमार की रचनात्मकता पर तीन पत्रवार्ताएँ हैं। शैलेन्द्र कुमार शैली, डाॅ. नीता व्यास और डाॅ. सरिता राय से संवाद हैं। 1960 में लिखे, 1966 में नई धारा (पटना) में प्रकाशित लेकिन पुनप्र्राप्त लेख अमृतराय की कहानियाँ: ‘नई कहानी की तात्कालिक परम्परा’ से पुस्तक का समापन होता है।

डाॅ. धनंजय वर्मा की प्रकाशित पुस्तकों से चुनकर चार संचयन भी अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। इन संचयनों की शुरूआत की डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के डाॅ. छबिल कुमार मेहेर ने ‘नयी किताब’ दिल्ली से प्रकाशित ‘आलोचना के प्रतिमान’ (2014) से। इसमें उनके द्वारा चुने हुए पच्चीस लेखों के अलावा डाॅ. मेहेर का एक लेख - ‘धनंजय वर्मा की समावेशी आलोचना’ और ‘धनंजय वर्मा से छबिल कुमार मेहेर की बातचीत’ भी संकलित है। 2014 में ही ‘आलोचना के आयाम’ में से संकलित दस निबन्धों का एक संकलन ‘आलोचना के सीमान्त’, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद ने प्रकाशित किया।

डाॅ. कृष्णदत्त पालीवाल के स्नेहाग्रह पर भारतीय ज्ञानपीठ से 2015 में ‘आधुनिक कवि विमर्श’ का प्रकाशन हुआ। इसमें पश्चिमी और भारतीय आधुनिकता, छायावादी कवि चतुष्कः एक पुनरावलोकन, छायावाद का उत्तर-राग (एक भारतीय आत्मा और ‘नवीन’ बच्चन और दिनकर) के अलावा अज्ञेय और धर्मवीर भारती, नागार्जुन और मुक्तिबोध, शमशेर और केदारनाथ अग्रवाल पर विस्तृत मूल्यांकनपरक आलेख है।.....

प्रसंगवश डाॅ. धनंजय वर्मा की प्रकाश्य पुस्तकों का विवरण भी आवश्यक लगता है। 2005 में प्रकाशित साक्षात्कारों, वार्ताओं और संवादों की पुस्तक ‘आलोचक का अंतरंग’ के बाद पत्र-पत्रिकाओं और संकलनों में बिखरे इक्कीस साक्षात्कारों, वार्ताओं और संवादों के साथ एक परिचर्चा का संकलन ‘आलोचक का बयान’ आईसेक्ट पब्लिकेशंस, भोपाल से 2020 में प्रकाशित हो गई है। ‘प्रेरणा (त्रैमासिक) में प्रकाशित धनंजय वर्मा से प्रमोद त्रिवेदी की अंतरंग बातचीत - ‘बात निकलेगी तो फिर दूर तलब जाएगी’ पुस्तकाकार प्रकाशित होने वाली है।

‘खुतूत से नुमायाँ हरदम’ पर अपने आलेख में डाॅ. रामशंकर द्विवेदी जी लिखते हैं: ‘‘एक प्रश्न के उत्तर में वर्मा जी ने बताया कि शानी मेरा बचपन का दोस्त था। उसके, मेरे पास, 150 से 200 पत्र होंगे। उन्हें ‘समावर्तन’ में इसलिए नहीं दे रहा हूँ कि कुछ पत्र छपने से बात उभरेगी नहीं इसलिए इन पत्रों के आधार पर मैं शानी पर एक आत्मकथात्मक आख्यान लिखने की योजना बना रहा हूँ और क्या अपने मित्र, अग्रज, रिश्तेदार डाॅ. प्रमोद वर्मा के पत्र नहीं छपाएँगे ? इस पर वर्मा जी का कहना है कि वे पत्र अत्यधिक पारिवारिक हैं, उनमें घर-गृहस्थी, नाते-रिश्तेदारी की बाते हैं, इसलिए उन पत्रों को देने का विचार नहीं है।’’...

यदि उसमें शानी चाचा के पत्रों को शामिल कर लिया जाता तो अव्वल ही छह सौ पृष्ठों की किताब कितनी और बड़ी हो जाती! इसलिए उनके पत्रों के साथ शानीजी की कहानियों और उपन्यासों पर अपने सारे लेखों को शामिल कर ‘यूँ होता तो क्या होता’ (शानी की पत्र कथा) की पाण्डुलिपि तैयार हो गयी। छह खण्डों में ‘शानी रचनावली’ के सम्पादक, साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली की ‘भारतीय साहित्य के निर्माता’ शृंखला में हिन्दी और उर्दू में ‘शानी’ (मोनोग्राफ) के लेखक और दिल्ली में शानी के हमदम डाॅ. जानकी प्रसाद शर्मा ने इस पाण्डुलिपि पर यह पत्र लिखा है:

डाॅ. जानकी प्रसाद शर्मा

पीएच.डी. (हिन्दी) अदीब (उर्दू)

09811517897

निवास: बी-330, अशोक नगर

शाहदरा, दिल्ली-110093

27 अक्टूबर, दीपावली, 2019

आदरणीय वर्मा जी,

नमस्कार। आपके 30 सितम्बर, 2019 के ख़त के साथ ‘‘यूँ होता, तो क्या होता’’ (शानी की पत्र कथा) की पाण्डुलिपि मौसूल हुई। आपने किताब के प्रकाशन के पूर्व इसके वाचन का मुझे अवसर दिया, यह आपका बड़प्पन है और मेरा सौभाग्य!

अपने सहयात्रियों और वरिष्ठों पर केन्द्रित आपकी ‘खुतूत से नुमायाँ’....आलेखमाला विभिन्न पत्रिकाओं की ज़ीनत बढ़ा चुकी है। जैसा कि मालूम हुआ, ये तमाम आलेख ‘खुतूत से नुमायाँ हमदम’ नाम से पुस्तकाकार आने को हैं। शानी और आपके दरमियान मुआमला अन्य प्रियजनों से मुख़्तलिफ़ है। डाॅ. प्रेमशंकर को लिखे एक ख़त में शानी की यह स्वीकारोक्ति है: ‘‘मैं अपने भाग्य पर इतराता हूँ कि बीबी के बाद शायद सबसे अधिक प्यार वह मुझसे ही करता है।’’ इससे आप दोनों की अंतरंगता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

दो लेखक मित्रों के बीच इतने सतत्, दीर्घकालिक और बेतकल्लुफ़ पत्र-संवाद की मिसालें कमयाब हैं। मेरी नज़र में ‘यूँ होता तो क्या होता’ की कुछ ख़ूबियाँ हैं, जो इस प्रकृति की और किताबों में नहीं मिलेंगी।

एक, यह महज़ क़रीब आधी सदी की ख़तो-किताबत की क्रमबद्ध प्रस्तुति नहीं है, बीच के अन्तरालों का आख्यान भी इसमें दर्ज़ है।

दूसरे, ख़तों और इन पर लगाए गए हाशियों की अन्तर्वस्तु से बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के सांस्कृतिक परिदृश्य की एक तस्वीर उभरकर सामने आती है।

तीसरे, इसमें शानी की रूदाद के साथ-साथ धनंजय वर्मा के आत्मकथ्य की आमेजिश भी है।

यह बात विशेष रूप से रेखांकित की जानी चाहिए कि शानी के ख़तों पर टिप्पणी करते हुए आपने मुनासिब संयम बरता है। ऐसे अवसरों को आप सलीक़े से बचा गए हैं, जहाँ अमर्ष का भाव आ सकता था। मैं इस क़िताब को हिन्दी गद्य में एक नई विद्या के इज़ाफ़े के तौर पर देखता हूँ - पत्रकथा या पत्राख्यान

सादर, आपका, जानकी प्रसाद शर्मा

पुनश्चः

आपके ‘पुरोवाक्’ (ख़ासतौर पर इसके समापन वाक्य) को पढ़कर मन भर आया। इन शब्दों में निहाँ वेदना को मैं महसूस कर सकता हूँ। मैंने आपके बालसखा शानी के पार्थिव शरीर को फ़ीरोज़शाह कोटला कब्रिस्तान में दफ़न होते देखा है।...

एक बात की मैं दाद दूँगा कि आपने वही सिर्फ वही- लिखा है जो सार्वजनिक किया जा सकता था। बहुत से राज़े-सरबस्तः आपने रक़म नहीं किये हैं और दोस्ती की पाक़ीज़गी पर दाग़ नहीं लगने दिया।

आपकी भाषा का तो मैं चोरी-छिपे अनुसरण करता रहा हूँ। भाषा का यह दोआब अब अगले वक़्तों की चीज़ हो गया है। - जानकी प्रसाद शर्मा

चार राज्यों के पाँच विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति कथाकार-कवि-आलोचक और संस्कृतिकर्मी श्री संतोष चैबे और कथाकार-आलोचक-सम्पादक श्री मुकेश वर्मा के विशेष स्नेह और अनुग्रह पर उपर्युक्त दोनों किताबें भी ‘आइसेक्ट पब्लिकेशंस’, भोपाल से प्रकाशित होने वाली हैं।

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, रायपुर के संस्थापक, छत्तीसगढ़ के पूर्व पुलिस महानिदेशक, शायरे-आज़म फ़िराक़ गोरखपुरी के नाती, कविवर विश्वरंजन द्वारा संपादित धनंजय वर्मा पर एकाग्र पुस्तक ‘शिलाओं पर तराशे मज़्मून’ की ‘पत्रावली’ मैं कवि-आलोचक-नाटककार और हमारे आदरणीय ताऊ जी प्रोफेसर प्रमोद वर्मा के दो पत्र संकलित हैं। रायगढ़ (म.प्र.) से दिनांक 01.07.1976 के अपने पत्र में वे लिखते हैं: ‘‘हस्तक्षेप उलट-पुलट कर देख गया हूँ। जल्दी ही ध्यान से पढूँगा। तुमने इसकी ‘रिव्यू’ करने का आग्रह किया है। इसे लेकर थोड़ी हिचकिचाहट हो रही है। आत्मीयतापूर्ण रिश्ते हों तब क्या आब्जेक्टिवली लिखा जा सकता है ? अगर ऐसी कोशिश, ईमानदारी कोशिश की भी जाए तो क्या दूसरे ऐसा मानेंगे ? मैं जानता हूँ हिन्दी में ‘सभी दूर’ ‘अहो रूपम, अहो ध्वनिः’ का ही मन्त्रोच्चार चल रहा है, लेकिन:

‘‘हम आह भी करते हैं, तो हो जाते हैं बदनाम

वो क़त्ल भी करते हैं, तो चर्चा नहीं होता।’’

उत्तरप्रदेश और बिहार और दिल्ली के लोग एक-दूसरे को उछालें तो वह जायज़, लेकिन हमारी ज़बान पर अपने लोगों के नाम भी आ जाएँ तो प्रादेशिकता का इल्ज़ाम लग जाता है। मैं भी सोचता हूँ, हमें भी इन स्क्रूपल्स को अब ताक़ पर रख देना चाहिए। ठीक है धनंजय - मैं करूँगा रिव्यू, लेकिन डोन्ट रश मी. आई शैल टेक माइ ओन टाइम. मंजूर है न! तुम्हारी दूसरी क़िताब भी वक़्त निकाल कर पढूँगा।’’

मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल के महामंत्री (और फिर अध्यक्ष) श्री अक्षय कुमार जैन (सम्मेलन पत्रिका- ‘विवरणिका के अप्रैल 2000 अंक में) सम्पादकीय- ‘‘स्व. प्रमोद वर्मा समय को नहीं पहचान पाए तो क्या ?’’ के सन्दर्भ में लिखे गए अपने पत्र में धनंजय जी, आदरणीय प्रमोद जी की चारित्रिक श्रेष्ठता की याद करते हुए लिखते हैं - ‘‘मैंने अपनी एक पुस्तक उन्हें भेंट की। कुछ दिनों बाद उन्होंने भी अपनी एक पुस्तक मुझे भेंट करते हुए लिखा- ‘‘मैंने तुम्हारी पुस्तक बड़े मनोयोग से पढ़ी। मैं यह उम्मीद करता हूँ कि तुम भी मेरी पुस्तक उसी मनोयोग से पढ़ोगे, लेकिन एक बात अपने बीच अभी तय हो जाए कि न मैं तुम पर लिखूँगा और न तुम मुझ पर लिखोगे। कम-से-कम हम लोग तो परस्पर प्रशंसा परिषद् के पार्षद न बनें.....’’

धनंजय जी तो अपने स्क्रूपल्स (नैतिक संकोच या धर्म-संकट) को ताक़ पर रखकर शुरू से ही अपने बचपन के दोस्त शानी जी के अलावा भोपाल के शुरूआती दिनों के मित्र दुष्यन्त कुमार त्यागी और रमेश बक्षी के रचनाकर्म पर खुलकर लिखा। ‘एक आवाज़: सबसे अलग’ (दुष्यन्त की रचनाशीलता) और ‘यूँ होता, तो क्या होता’ (शानी की पत्र कथा) के बाद सागर विश्वविद्यालय, सागर में अध्ययन के दौरान 1957 से अब तक के अपने घनिष्ठ-आत्मीय मित्र पर भी उनकी एक किताब- ‘जीवन का महाराग’ (प्रभात कुमार भट्टाचार्य की रचनाशीलता) संस्कृति प्रकाशन, सूरत से प्रकाशित हो रही है।

अपनी अनेक व्याधियों और शारीरिक अक्षमताओं की वज़ह से कई वर्षों से घर तक सीमित, लगभग आत्मनिर्वासित, धनंजय जी आज भी लेखन में सक्रिय हैं। वे अपने व्याख्यानों के नोट्स के आधार पर ‘वाणी की विभूति’ पुस्तक पर काम कर रहे हैं। अपने विद्यार्थियों द्वारा उपलब्ध - ‘पश्चिमी आलोचना’ के कक्षालापों के प्रारूपों के आधार पर एक पुस्तक तैयार करने का भी उनका इरादा है।

कामना और प्रार्थना है कि वे अपने संकल्प पूरे कर सकें।

एफ 2/31, आवासीय परिसर, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन-456010

निवेदिता वर्मा

मो. 9425066911

सहायक पुस्तकेंः 1.शिलाओं पर तराशे मज़्मून: संपादक: विश्वरंजन, 2. आलोचना के शिखर पुरुष: डाॅ.धनंजय वर्मा: संपादन: डाॅ. आरती दुबे,3. आलोचना के अमृत पुरुषः

डाॅ. धनंजय वर्मा, डाॅ. प्रमोद त्रिवेदी

पत्रिकाएँ: 4. ‘समावर्तन’ (जुलाई 2015), 5. राग भोपाली (जून 2014)

पुनश्चः इस सर्वेक्षण में उल्लिखित एवं संकलित समस्त लेखकों-सम्पादकों की मैं हृदय से आभारी हूँ।